महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय एवम जयंती 28 April

महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय एवम जयंती 28 April
आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में बौद्धों का वर्चस्व था। वेदों को अप्रामाणिक सिद्ध करने में बौद्धों ने पूरी शक्ति लगा दी थी और उन्हें राज्याश्रय प्राप्त था।उनके तर्क अकाट्य मान लिए गए थे। नागार्जुन, वसुबंधु, धर्मकीर्ति और दिंगनाग जैसे बौद्ध दार्शनिकों की बातों का कोई तोड़ तब वैदिक धर्मावलम्बियों के पास नहीं था।
सनातन धर्म पर इससे बड़ा संकट इससे पहले कभी नहीं आया था। ना ही उसके बाद कभी आया। यों तो कालान्तर में सनातन धर्म पर यवनों, म्लेच्छों, विधर्मियों, विदेशियों ने अनेक प्रहार किए, किंतु वे सभी बाहरी आक्रमण थे, उसकी मूल दार्शनिक-मान्यताओं को तो बौद्धों ने ही सबसे प्रमुख चुनौती दी थी।
हिंदुस्तान में उस वक्त बौद्ध धर्म की पताका सबसे अधिक ऊंची लहरा रही थी। हर कोई बौद्ध बनने के लिए व्याकुल हो चला था। जनता में एक प्रकार की छटपटाहट थी कि कैसे कठिन और कठिनतर होते जा रहे वैदिक धार्मिक कर्मकाण्डों से मुक्ति पायी जाए। निश्चित रूप से ये एक भयावह स्थिति थी और सनातन विचारधारा अपने सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही थी।
जब जब काल के प्रभाव से सनातन धर्म लडखडाता है तभी कोई कोई संत महात्मा जन्म लेकर सनातन को उबार लेता है और आने वाले समय के लिए भी मजबूती भी प्रदान कर देता है।
शंकर का जन्म केरल के एक गरीब ब्राह्मण (नंबूदरी) परिवार में हुआ।शंकराचार्य छोटे ही थे, जब उनके पिता का निधन हो गया। ऐसे में उनका पालन-पोषण उनकी मां ने किया।वे कृष्ण भक्त थीं, जो वैष्णव सम्प्रदाय के आराध्य देव हैं।मां के काफी विरोध के बावजूद शंकराचार्य ने संन्यास का रास्ता चुना क्योंकि वे वैदान्तिक दृष्टिकोण के समर्थक थे।
शंकर "ब्रह्मचारी" थे और मात्र 32 वर्ष की आयु में देह त्यागने तक आजीवन ब्रह्मचारी ही रहे। फिर भी, "किम् आश्चर्यम्", कि अपने जीवन की सबसे कठिन परीक्षा का संधान उन्होंने "यौन अनुभूतियों" पर संवाद के माध्यम से किया था। यह चमत्कार भला कैसे संभव हुआ?
अद्भुत कथा है। आदि शंकराचार्य "वेदान्ती" थे। उनके काल में मंडन मिश्र कट्टर "मीमांसक" के रूप में प्रतिष्ठित विद्वान थे।
"उत्तर-मीमांसा" के शलाकापुरुष के रूप में शंकर अपने "अद्वैत-वेदान्त" की ध्वजा फहराने निकले थे। वह "सनातन" का अश्वमेध था। बौद्धों के "अनित्य" और "अनात्म" के चिंतन से चले आए दोषों का समाहार करना उसका प्राथमिक लक्ष्य था। और यूं तो शंकर का सीधा मुक़ाबला महायानियों के "माध्यमिक" दर्शन से था, किंतु माहिष्मती नगरी (वर्तमान मंडलेश्वर) के मंडन मिश्र से पार पाए बिना वह अश्वमेध संभव ना था।
मंडन मिश्र तब काशी में विराजे थे। शंकर पहुंचे शास्त्रार्थ करने।
मंडन कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। कुमारिल घोर मीमांसक थे। मीमांसा दर्शन के "भाट्टमत" के प्रवर्तक। शास्त्रार्थ में वे बौद्धों को परास्त कर चुके थे, इस तरह एक अर्थ में शंकर का काम सरल ही कर चुके थे। मंडन के साथ ही मध्व भी उनके अनुयायी थे, जो शंकर के कट्टर विरोधी और दुर्दम्य द्वैतवादी थे। यानी कुमारिल के अनुयायियों से शंकर का एक निरंतर मतभेद रहा था।
शंकर-मंडन के शास्त्रार्थ की कथा किंवदंतियों में अग्रणी है। काशी में दोनों का शास्त्रार्थ हुआ। कोई कहता है इक्कीस दिन चला, कोई कहता है बयालीस दिन। अंत में मंडन परास्त हुए। शंकर उठने को ही थे कि मंडन की पत्नी आगे बढ़ी। कोई उनका नाम भारती बताता है, कोई सरस्वती। विदुषी थीं। बोलीं, "मैं मंडन की अर्द्धांगिनी हूं, इसलिये मंडन अभी आधे ही परास्त हुए हैं। मुझसे भी शास्त्रार्थ कीजिए।" शंकर अब भारती से शास्त्रार्थ करने बैठे। इक्कीस दिनों में उन्हें भी परास्त किया।
विजेता-भाव से शंकर उठने को ही थे कि भारती ने "ब्रह्मास्त्र" चला। बोलीं : "मान्यवर, अब "कामकला" के बारे में भी विमर्श हो जाए!"
शंकर ब्रह्मचारी थे। हठात असमंजस में पड़ गए। सर्वज्ञाता थे किंतु एक स्त्री की शक्ति कहां व्यापती है, यह आभास उन्हें पहली बार हुआ।
उन्हें संकोच में देख भारती का बल बढ़ा। कहा, "प्रीति के चार प्रकार हैं, संभोग के आठ। सात रतविशेष हैं, काम की दस अवस्थाएं हैं। "दंतक्षत" और "बिंदुमाला" के बारे में कुछ बताइए। "औपरिष्टक" और "वरणसंविधान" पर आपके क्या विचार हैं? संभोग को "ब्रह्मानंद सहोदर" बताया गया है और वात्स्यायन को "ऋषि" स्वीकारा गया है। इतने व्यापक विषय पर चर्चा किए बिना आपकी विजय नहीं स्वीकारी जाएगी।"
शंकर अन्यमनस्क हो गए। फिर कुछ देर ठहरकर प्रकृतिस्थ भाव से बोले, "मैं तो ब्रह्मचारी हूं। कामसुख का मुझे कोई अनुभव नहीं। किंतु कुछ दिनों का अवसर मिले तो लौटकर बताऊं।"
मंडन और भारती राज़ी हो गए। किंवदंती है कि शंकर ने एक भोगी राजा की मृत देह में "परकाया प्रवेश" किया। चौबीस "कर्माश्रया", बीस "द्यूताश्रया", सोलह "शयनोपचारिका" और चार "उत्तर कला", इस तरह कुल चौंसठ कलाओं का व्यवहार किया। प्रवीण होकर लौटे। और अबकी भारती को "कामकला" पर विमर्श में भी परास्त किया। मंडन और भारती दोनों शंकर के शिष्य बने। शंकर ने मंडन को एक धाम का गुरुभार सौंपा।
शंकर अकेले अपने बूते भारत में सनातन धर्म की पुन:प्रतिष्ठा करने में सफल रहे। बौद्धों का तब जो पराभव हुआ तो आज तक वे भारत में अपनी धरती नहीं पा सके।
आज जो भी सनातन-धर्म की विधियों पर प्रहार करते हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि उसके स्वरूप को नष्ट किए बिना भारत से सनातन-धर्म का उन्मूलन नहीं किया जा सकता, और भारत के गुणसूत्र इस स्वरूप से इतने अविच्छिन्न हो गए हैं कि इसे नष्ट करना सम्भव नहीं। प्रयाग में त्रिवेणी-संगम पर तुषानल के दाह में कुमारिल को जिस तत्व का बोध हो गया था, जिसकी धर्मध्वजा शंकर ने चारो ओर फहराई, उसकी मानहानि करना कम से कम वामाचारी विदूषकों के बस का रोग नहीं है।